डायरी एंट्री ३- मेरी मलाई

आज सुबह मन किया कि ब्लॉग्स की इस श्रृंखला को आगे बढ़ाया जाये। एक और पुरानी याद इंटरनेट के हवाले की जाए। अपना लैपटॉप उठाया और सोच ही रहा था क्या लिखूं , कि मेरी पत्नी नेहा ने रसोई से पुकारा - "सुनो, मेरी थोड़ी मदद कर दो! "  मैं लिखने के पूरे मूड में आ चुका था की तभी मेरे रंग में भंग पड़ गया। इस बात से मैं चिढ गया और क्रोध के उस एक क्षण में मैंने ये निर्णय ले लिया की बस! अब ब्लॉग्गिंग बंद।

रसोई में काम बहुत था और आजकल तो सुबह सात-आठ बजे ही तीव्र धुप के कारण, वहां ५ मिनट भी काम करना बड़ा ही कष्टकर होता है। उसकी विनती भी उचित थी। छोटी सी मदद ही तो मांगी थी, सुबह का नाश्ता, दोपहर के लिए टिफ़िन, सब तैयार भी तो कर रही थी। आत्मनिरीक्षण अनिवार्य लगा। अतीत में झाँक कर देखा तो अपने चरित्र की इसी नकारात्मकता को दर्शाती एक कहानी याद आ गयी। यूँ तो ये कहानी कई बार याद आती है, परन्तु आज इसका एक अलग ही पहलू मुझे दिखाई दिया।

मेरी उम्र संभवतः ६-७ वर्ष की रही होगी। तब मम्मी हर रोज़ मुझे मलाई-बूरा (unrefined sugar) मिलाकर देती थी, जिसे मैं बड़े ही चाव से खाता था। उस वर्ष गर्मियों की छुट्टियों में मेरी बुआ, जिन्हें हम प्यार से बब्बन बुआ कह कर पुकारते हैं, हमारे घर रहने आयी हुई थीं। बब्बन बुआ मुझसे केवल छह वर्ष ही बड़ी हैं। एक दिन उन्होंने मम्मी से मलाई खाने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन घर में उतनी ही मलाई थी कि किसी एक को ही दी जा सकती थी। अब मुझे तो रोज़ ही मिलती थी इसलिए मम्मी ने उस दिन मेरी बजाय बुआ को दे दी। इस छोटी सी बात से मेरा मन इतना उचट गया, की मैंने आने वाले शायद दस-बारह वर्षों तक मलाई-बूरा को हाथ तक नहीं लगाया।

खैर गुस्से में लिए आज सुबह के उस निर्णय को अमान्य कर, अंततः मैंने इस ब्लॉग को पूरा भी कर लिया और नेहा ने इसकी प्रूफ़रीडिंग करके इसे प्रकाशित करने योग्य भी बना दिया। अपने व्यवहार में आये इस परिवर्तन को देख कर मुझे ये एहसास हुआ कि भाग्यवश बचपन की वो नकारात्मकता आज के मेरे चरित्र पर उतनी हावी नहीं है, और होनी भी नहीं चाहिए।

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