डायरी एंट्री २- स्कूल बस
मैं स्कूल जाने लगा था। रोज़ सुबह बड़े जतन से मम्मी मुझे तैयार करती, नाश्ता करवाती और बैग में टिफ़िन डाल के मुझे स्कूल बस तक छोड़ने जाती। 'कैलाश पथ' के अंतिम छोर से स्कूल बस मुझे और कुछ सहपाठिओं को लेने आया करती थी। मैं शायद नर्सरी कक्षा में पढता था। छोटा ही था, इसलिए रोज़ स्कूल न जाने की ज़िद करता और मम्मी के ज़बरदस्ती बस में बैठा देने पर बहुत रोता था। बस वाले कंडक्टर अंकल और कुछ शिक्षक, मुझे और कुछ और रोते हुए बच्चों को प्यार से समझाते-बुझाते और चुप कराते। पांच-दस मिनट के बाद ही उनके ये प्रयास सफल हो पाते और मैं अंततः शांत हो जाता।
घर के लगभग १ मील दूर से मेरा एक 'पक्का दोस्त', नागेश, मेरी ही तरह रोता बिलखता बस में चढ़ता था। अब चूंकि मैं शांत हो चुका होता था, अपने दोस्त को रोता देख तब मेरे भीतर एक बड़े भाई वाली अनुभूति जन्म ले लेती थी। उसके कंधे पर हाथ रख के, उसकी पीठ थपथपाते हुए अब मैं उसे बड़ों की तरह पुचकारता और शांत करने का पूरा प्रयास करता। मुझे ठीक से याद तो नहीं पर संभवतः लम्बे समय तक यही नियम था। ४-६ महीने तक प्रतिदन रोते हुए बस में चढ़ना और खुद शांत हो जाने के बाद अपने रोते हुए दोस्त को चुप कराना।
इस छोटी सी कहानी का क्या महत्त्व है ये तो मुझे समझ नहीं आता पर शायद इसे बार बार पढूंगा तो बचपन के इस आचरण को अपने आज के चरित्र में मनोगत कर पाऊंगा।
घर के लगभग १ मील दूर से मेरा एक 'पक्का दोस्त', नागेश, मेरी ही तरह रोता बिलखता बस में चढ़ता था। अब चूंकि मैं शांत हो चुका होता था, अपने दोस्त को रोता देख तब मेरे भीतर एक बड़े भाई वाली अनुभूति जन्म ले लेती थी। उसके कंधे पर हाथ रख के, उसकी पीठ थपथपाते हुए अब मैं उसे बड़ों की तरह पुचकारता और शांत करने का पूरा प्रयास करता। मुझे ठीक से याद तो नहीं पर संभवतः लम्बे समय तक यही नियम था। ४-६ महीने तक प्रतिदन रोते हुए बस में चढ़ना और खुद शांत हो जाने के बाद अपने रोते हुए दोस्त को चुप कराना।
इस छोटी सी कहानी का क्या महत्त्व है ये तो मुझे समझ नहीं आता पर शायद इसे बार बार पढूंगा तो बचपन के इस आचरण को अपने आज के चरित्र में मनोगत कर पाऊंगा।
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