डायरी एंट्री ४- पुस्तकें, पापा का गुस्सा और अन्य घटनायें
यह वृत्तांत Story है तो बड़ा ही क्षुद्र Trivial , परन्तु इसमें बहुत सी ऐसी बातें हैं, ऐसी यादें हैं, जिन्हें अलग-अलग विशिष्ट Specific कहानियों में पिरोना मेरे लिए थोड़ा कठिन होता। इसलिए सोचा कि सबको एक ही जगह संकलित Compile कर लूँ। बचपन में कहानियों की पुस्तकें, कॉमिक बुक आदि पढ़ने में, मुझे और मेरे भाई तरुण को बहुत रूचि थी। ज्यों ही महीना समाप्त होने को आता, हम दोनों भाई बड़ी आतुरता से Eagerly , उस समय की एक प्रसिद्ध पत्रिका, "नंदन" के आने की बाट जोहने लगते। उसके अलावा छुट्टी वाले दिन, मतलब इतवार को, पास की दुकान से किराए पर कॉमिक बुक्स भी अनिवार्य रूप से लाया करते थे। पापा को अक्सर काम के सिलसिले में आस पास के शहरों का दौरा करना पड़ता था। और चूंकि भारत के लगभग हर बड़े रेलवे स्टेशन पर व्हीलर बुकस्टाल भी होती ही थी, हमारी पुस्तकों की आपूर्ति कई बार वहां से भी हो जाया करती। साल में एक-दो बार जब भी माँ जी-बाबाजी (मेरे दादा-दादी) से मिलने ऋषिकेश जाते, वहाँ गीता प्रेस की दुकान से कहानियों की क...