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Showing posts from 2017

डायरी एंट्री ५- कहानी बचपन वाली

बहुत समय से मैं एक कहानी लिखना चाहता था- कोई एक कहानी बचपन वाली। इसीलिए पिछले दो-तीन हफ्तों से कोई डायरी एंट्री नहीं लिख पाया, क्योंकि बचपन में पढ़ी-सुनी कई कहानियों को याद करने की कोशिश कर रहा था। उन्हीं यादों को जोड़-तोड़ कर ख़ुद की एक कहानी बनाने में व्यस्त था। अंततः कुछ हद तक सफल भी रहा और दो भागों वाली एक कहानी लिख ही डाली। जब हम दोनों भाई छोटे थे तब मम्मी हमें बड़ी ही मज़ेदार कहानियाँ सुनाया करती थीं। मम्मी के पास कहानियों का भण्डार था। कई कहानियाँ जो मम्मी ने अपने बचपन में पढ़ीं थी और कई ऐसी कहानियाँ जो उन्होनें मेरे नाना-नानी से सुनी थीं। उन कहानियों की एक और ख़ास बात यह थी की वे बहुत लम्बी होती थीं। राजा रानी की कहानी, जानी चोर की कहानी, रानी महकदे की कहानी और पता नहीं कौन कौन सी कहानी। छोटी कहानियाँ सुनने में भी मज़ा तो आता था किन्तु यदि कहानी बहुत लम्बी हो तो मज़ा दुगुना हो जाता था। जंगल में खोये हुए राजसी युगल जो कई मायावी राक्षसों से बचते हुए, कुछ भले मानसों की सहायता से अपने महल लौट आते थे...

डायरी एंट्री ४- पुस्तकें, पापा का गुस्सा और अन्य घटनायें

यह वृत्तांत Story है तो बड़ा ही क्षुद्र Trivial , परन्तु इसमें बहुत सी ऐसी बातें हैं, ऐसी यादें हैं, जिन्हें अलग-अलग  विशिष्ट Specific कहानियों में पिरोना मेरे लिए थोड़ा कठिन होता। इसलिए सोचा कि सबको एक ही जगह संकलित Compile कर लूँ। बचपन में कहानियों की पुस्तकें, कॉमिक बुक आदि पढ़ने में, मुझे और मेरे भाई तरुण को बहुत रूचि थी। ज्यों ही महीना समाप्त होने को आता, हम दोनों भाई बड़ी आतुरता से Eagerly , उस समय की एक प्रसिद्ध पत्रिका, "नंदन" के आने की बाट जोहने लगते। उसके अलावा छुट्टी वाले दिन, मतलब इतवार को, पास की दुकान से किराए पर कॉमिक बुक्स भी अनिवार्य रूप से लाया करते थे। पापा को अक्सर काम के सिलसिले में आस पास के शहरों का दौरा करना पड़ता था। और चूंकि भारत के लगभग हर बड़े रेलवे स्टेशन पर व्हीलर बुकस्टाल भी होती ही थी, हमारी पुस्तकों की आपूर्ति कई बार वहां से भी हो जाया करती। साल में एक-दो बार जब भी माँ जी-बाबाजी (मेरे दादा-दादी) से मिलने ऋषिकेश जाते, वहाँ गीता प्रेस की दुकान से कहानियों की क...

डायरी एंट्री ३- मेरी मलाई

आज सुबह मन किया कि ब्लॉग्स की इस श्रृंखला को आगे बढ़ाया जाये। एक और पुरानी याद इंटरनेट के हवाले की जाए। अपना लैपटॉप उठाया और सोच ही रहा था क्या लिखूं , कि मेरी पत्नी नेहा ने रसोई से पुकारा - "सुनो, मेरी थोड़ी मदद कर दो! "  मैं लिखने के पूरे मूड में आ चुका था की तभी मेरे रंग में भंग पड़ गया। इस बात से मैं चिढ गया और क्रोध के उस एक क्षण में मैंने ये निर्णय ले लिया की बस! अब ब्लॉग्गिंग बंद। रसोई में काम बहुत था और आजकल तो सुबह सात-आठ बजे ही तीव्र धुप के कारण, वहां ५ मिनट भी काम करना बड़ा ही कष्टकर होता है। उसकी विनती भी उचित थी। छोटी सी मदद ही तो मांगी थी, सुबह का नाश्ता, दोपहर के लिए टिफ़िन, सब तैयार भी तो कर रही थी। आत्मनिरीक्षण अनिवार्य लगा। अतीत में झाँक कर देखा तो अपने चरित्र की इसी नकारात्मकता को दर्शाती एक कहानी याद आ गयी। यूँ तो ये कहानी कई बार याद आती है, परन्तु आज इसका एक अलग ही पहलू मुझे दिखाई दिया। मेरी उम्र संभवतः ६-७ वर्ष की रही होगी। तब मम्मी हर रोज़ मुझे मलाई-बूरा (unrefined sugar...

डायरी एंट्री २- स्कूल बस

मैं स्कूल जाने लगा था। रोज़ सुबह बड़े जतन से मम्मी मुझे तैयार करती, नाश्ता करवाती और बैग में टिफ़िन डाल के मुझे स्कूल बस तक छोड़ने जाती। 'कैलाश पथ' के अंतिम छोर से स्कूल बस मुझे और कुछ सहपाठिओं को लेने आया करती थी। मैं शायद नर्सरी कक्षा में पढता था। छोटा ही था, इसलिए रोज़ स्कूल न जाने की ज़िद करता और मम्मी के ज़बरदस्ती बस में बैठा देने पर बहुत रोता था। बस वाले कंडक्टर अंकल और कुछ शिक्षक, मुझे और कुछ और रोते हुए बच्चों को प्यार से समझाते-बुझाते और चुप कराते। पांच-दस मिनट के बाद ही उनके ये प्रयास सफल हो पाते और मैं अंततः शांत हो जाता।     घर के लगभग १ मील दूर से मेरा एक 'पक्का दोस्त', नागेश, मेरी ही तरह रोता बिलखता बस में चढ़ता था। अब चूंकि मैं शांत हो चुका होता था, अपने दोस्त को रोता देख तब मेरे भीतर एक बड़े भाई वाली अनुभूति जन्म ले लेती थी। उसके कंधे पर हाथ रख के, उसकी पीठ थपथपाते हुए अब मैं उसे बड़ों की तरह पुचकारता और शांत करने का पूरा प्रयास करता। मुझे ठीक से याद तो नहीं पर संभवतः लम्बे समय तक यही नियम था।  ४-...

डायरी एंट्री १- गाय वाली घटना

बहुत समय से ये सोचता था की अपने बचपन से लेकर अबतक के जीवन में जो छोटी छोटी बातें, घटनाएं, कारण या अकारण ही याद रह जाती हैं, उन्हें किसी डायरी में, या ऐसे किसी ब्लॉग में सँजो कर रख लिया जाय। वो बातें जिनमें से कुछ बहुत महत्त्व भी रखती हैं, पर कुछ महत्वहीन, निरर्थक, परन्तु फिर भी याद रह जातीं हैं। आज ऐसी ही एक छोटी घटना लिख के रख लेता हूँ। कोशिश रहेगी की नियमित रूप से ऐसी और कहानियां, किस्से इस ब्लॉग में जोड़ता रहूँ, भले ही कालानुक्रम ना हों, पर लिखता रहूँ।  मैं तब बहुत छोटा था। शायद स्कूल जाने ही लगा था या फिर शायद नहीं ही जाता था। मेरा भाई तरुण, जो मुझसे २ साल छोटा है, तब भी तेज़ दिमाग था, और बड़ों की आदतों की नक़ल करना तुरंत ही सीख जाता था। मम्मी की ये आदत थी की रोज़ सुबह नाश्ता बनाते वक़्त पहली रोटी गाय के लिए बनाती थी, और फिर गली में जो भी पहली गाय दिखती, उसे अपने हाथ से वो रोटी खिला देती थी। मैं और तरुण रोज़ ये देखते थे, कभी कभी ज़िद करते थे की हम भी अपने हाथ से गाय को रोटी खिलाएंगे। डर तो लगता...